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Wednesday, January 1, 2025

Yeh Nav Varsh Hame Swikar Nahi

Yeh Nav Varsh Hame Swikar Nahi (ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं from राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर)


ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं


है अपना ये त्यौहार नहीं

है अपनी ये तो रीत नहीं

है अपना ये व्यवहार नहीं

धरा ठिठुरती है सर्दी से


आकाश में कोहरा गहरा है

बाग़ बाज़ारों की सरहद पर

सर्द हवा का पहरा है

सूना है प्रकृति का आँगन

कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं


हर कोई है घर में दुबका हुआ

नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं

चंद मास अभी इंतज़ार करो

निज मन में तनिक विचार करो

नये साल नया कुछ हो तो सही


Thursday, October 19, 2023

कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है(गोपालदास नीरज की कविता)

कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

Saturday, October 17, 2020

छोटा सा गाँव मेरा पुरा बिग् बाजार था !

 छोटा सा गाँव मेरा

पुरा बिग बाजार था !

एक नाई, एक मोची,

एक अच्छा  लुहार था !!

छोटे छोटे घर थे

हर आदमी बङा दिलदार था !

छोटा सा गाँव मेरा

पुरा बिग बाजार था !!

कही भी रोटी खा लेते 

हर घर मे भोजऩ तैयार था !

बाड़ी की सब्जी मजे से खाते थे 

जिसके आगे शाही पनीर बेकार था !!

छोटा सा गाँव मेरा

पुरा बिग् बाजार था !

दो मिऩट की मैगी ना, 

झटपट दलिया तैयार था !!

नीम की निम्बोली और शहतुत सदाबहार था 

अपना घड़ा कस कै बजा लेते !

समारू पुरा संगीतकार था,,

छोटा सा गाँव मेरा पुरा बिग बाजार था !!

मुल्तानी माटी से तालाब में नहा लेते,

साबुन और स्विमिंग पूल बेकार था !

और फिर कबड्डी खेल लेते

हमे कहाँ क्रिकेट का खुमार था !!

छोटा सा गाँव मेरा

पुरा बिग् बाजार था।।।

दादी की कहानी सुन लेते 

कहाँ टेलीविज़न और अखबार था !

भाई - भाई को देख के खुश था,

सब मे बहुत प्यार था !!

छोटा सा गाँव मेरा पुरा बिग बाजार था !!

वो प्यार, वो संस्कृति

मैं अब कहाँ से लाऊं !

ये सोच सोच कर

मैं बहुत दुख पाऊं !!

जो वो समय फिर आ जा्य 

तो बहुत मजा आ जाय !

मैं अपनी असली जिन्दगी जी पाऊं 

और मैं इस धरती को सौ-सौ शीश झुकाऊं !!

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    Wednesday, September 5, 2018

    ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?

    ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?

    ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
    भेद में अभेद खो गया।
    बँट गये शहीद, गीत कट गए,
    कलेजे में कटार दड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।

    खेतों में बारूदी गंध,
    टूट गये नानक के छंद
    सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
    वसंत से बहार झड़ गई
    दूध में दरार पड़ गई।

    बाधाएँ आती हैं आएँ

    बाधाएँ आती हैं आएँ

    बाधाएँ आती हैं आएँ
    घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
    पावों के नीचे अंगारे,
    सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
    निज हाथों में हँसते-हँसते,
    आग लगाकर जलना होगा।
    क़दम मिलाकर चलना होगा।

    हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
    अगर असंख्यक बलिदानों में,
    उद्यानों में, वीरानों में,
    अपमानों में, सम्मानों में,
    उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
    पीड़ाओं में पलना होगा।
    क़दम मिलाकर चलना होगा।

    Monday, October 15, 2012

    जो बीत गई सो बात गई

    जो बीत गई सो बात गई

    जीवन में एक सितारा था
    माना वह बेहद प्यारा था
    वह डूब गया तो डूब गया
    अंबर के आंगन को देखो
    कितने इसके तारे टूटे
    कितने इसके प्यारे छूटे
    जो छूट गए फ़िर कहाँ मिले
    पर बोलो टूटे तारों पर
    कब अंबर शोक मनाता है
    जो बीत गई सो बात गई

    जीवन में वह था एक कुसुम
    थे उस पर नित्य निछावर तुम
    वह सूख गया तो सूख गया
    मधुबन की छाती को देखो
    सूखी कितनी इसकी कलियाँ
    मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
    जो मुरझाईं फ़िर कहाँ खिलीं
    पर बोलो सूखे फूलों पर
    कब मधुबन शोर मचाता है
    जो बीत गई सो बात गई

    साथी, सब कुछ सहना होगा!

    साथी, सब कुछ सहना होगा! 

    मानव पर जगती का शासन,
    जगती पर संसृति का बंधन,
    संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
    साथी, सब कुछ सहना होगा!

    हम क्या हैं जगती के सर में!
    जगती क्या, संसृति सागर में!
    एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
    साथी, सब कुछ सहना होगा!

    किस कर में यह वीणा धर दूँ?

    किस कर में यह वीणा धर दूँ?

    देवों ने था जिसे बनाया,
    देवों ने था जिसे बजाया,
    मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ?
    किस कर में यह वीणा धर दूँ?

    इसने स्वर्ग रिझाना सीखा,
    स्वर्गिक तान सुनाना सीखा,
    जगती को खुश करनेवाले स्वर से कैसे इसको भर दूँ?
    किस कर में यह वीणा धर दूँ?

    अग्निपथ कविता

     अग्निपथ कविता

    वृक्ष हो भले खड़े, हो घने हो बड़े, एक पत छाव की |
    मांग मत, मांग मत, मांग मत ||
    अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ |||
    तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी |

    Monday, October 1, 2012

    कोशिश करने वालों की - (हरिवंशराय बच्चन)/Lehron se dar kar nauka paar nahi hoti (Good one Poem by Harivanshrai Bachchan)


    Lehron se dar kar nauka paar nahi hoti (Good one Poem by Harivanshrai Bachchan)

    कोशिश करने वालों की- हरिवंशराय बच्चन


    लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। 
    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।